Friday, October 10, 2008

रेतीला आकाश था हवा न थी मनमानी

दूर छोड़ आए जिसे हर काफिले

वोह नज़र धुप की आड़ से रात को ताकती है..
धीरे धीरे बुझ रहा था वोह आंखों का दीपक और
बुझती हुई हर नज़र अपनों का एक दीदार मांगती
अब तो आंसू ही बन गए थे गंगा का पानी

वोह देह जलने को अपनी सी एक मशाल मांगती थी

जलके राख हो गई किसी के इंतज़ार में

अब तो कतरा बनके हवा के साथ ही हो गई मगर

बिखरा हुआ हर कतरा अपनों के लिए दुआ माँगा था